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समाज बोध ही है पत्रकारिता का मूल्यबोध


- अजय बोकिल

जब मीडिया में ही मूल्यबोध को सहेजने का आग्रह पुरजोर तरीके से उठने लगे, तब समझना चाहिए कि पत्रकारिता जैसे गंभीर पेशे पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। ये ऐसे बादल हैं, जो कुछ तो बाहरी हैं और कुछ खुद मीडिया के अपने आंतरिक कारणों और व्यावसायिक हितों की पूर्ति के लिए बेलगाम आचरण के कारण भी हैं। वास्तव में कोई भी प्रोफेशन अथवा व्यवसाय मूल्यविहीनता से चल ही नहीं सकता। कोई भी मूल्य किसी भी व्यवसाय का वह न्यूनतम प्रतिबद्धता बिंदु है, जिस पर उसकी इमारत खड़ी होती  है। एक प्रत्यक्ष और परोक्ष नैतिक तंत्र आकार लेता है। मूल्य ही किसी व्यवसाय या उपक्रम को नैतिक साहस और समाजहित में जोखिम उठाने  की शक्ति देता है। बावजूद तमाम चुनौतियों के पत्रकारिता से मूल्यबोध और आत्माभिमान पूरी तरह खत्म हो गया है, ऐसा मैं नहीं मानता। पत्रकारिता में ऐसे लोगों की संख्या भले कम हो, लेकिन वो अपने तरीके से मूल्यबोध की मशाल जलाए हुए हैं। उसका स्वरूप अलग-अलग हो सकता है।

पत्रकारिता चूंकि सीधे समाज से जुड़ा, उसके  सवालों से रोज मुठभेड़ करने वाला, समाज की पीड़ा, उथलपुथल और चिंताओं को अभिव्यक्त करने वाला व्यवसाय है, इसलिए उसके मूल्यबोध पर प्रश्नवाचक चिह्न पहले भी लगते रहे हैं। लेकिन जब भी ऐसा वक्त आया है, पत्रकारिता ने अपनी नैतिक ध्‍वजा को हमेशा ऊपर रखा है। यही वजह है कि व्यापक आलोचनाओं के बाद भी सच्चाई को जानने, तथ्‍यों को परखने, वैचारिक द्वंद्व में जनपक्ष को समझने, समाज और इतिहास बोध के साथ-साथ वास्तविकता और फेक न्यूज के बीच में भी सही खबर लोगों तक पहुंचाने का व्यापक माध्यम आज भी मीडिया ही है। यहां तीन सवाल  प्रासंगिक हैं। पहला तो मीडिया का मूल्यबोध है क्या? दूसरे क्या यह समाज के मूल्यबोध से कुछ अलग है ? तीसरे, आज पत्रकारिता के मू्ल्यबोध के संरक्षण पर चर्चा की जरूरत क्यों आन पड़ी?

हम सभी जानते हैं कि पत्रकारिता जैसे पेशे का व्यवसाय का जन्म मूलत समकालीन समाज में घट रही घटनाओं को जानने की जिज्ञासा, उन्हें लोगो तक पहुंचाने के आग्रह और तदनुसार समाज का मानस बनाने की इच्छा से हुआ है। जिज्ञासा मनुष्य का स्वभाव है, इसलिए वह अपने घर से लेकर, पास पड़ोस, शहर, अंचल, प्रदेश, देश और दुनिया की हलचल के बारे में जानना चाहता है। जो हो रहा है, वह उसका सही गलत के रूप में आकलन, विश्लेषण करता है। उसका औचित्य- अनौचित्य तय करता है। इसकी बुनियाद में अमूमन निजी से ज्यादा समाज हित और राष्ट्रहित ही होता है।

मीडिया मूल्यबोध के संदर्भ में भी यही आग्रह व्यापक रूप में काम करता है। चूंकि मीडिया एक जीवंत समाज और लोकतंत्र की धड़कन का अनिवार्य हिस्सा है, इसलिए वह क्षुद्र स्वार्थों से सर्वथा ऊपर है, ऐसा मानना गलत होगा। ऐसे स्वार्थो में निहित स्वार्थ, राजनीतिक  व आर्थिक स्वार्थ समाहित हो सकते हैं, लेकिन समाज और राष्ट्र का हित इन सबसे ऊपर होना चाहिए। चूंकि हम लोकतंत्र हैं, इसलिए लोकतंत्र के प्रति हमारी पहली प्रतिबद्धता है। इस दृष्टि से लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा मीडिया का पहला मूल्यबोध होना चाहिए। दूसरा है जनता तक सही जानकारी पहुंचाना। किसकी खास एजेंडे के बजाए खबर को उसके शुद्ध रूप में पहुंचाना और पाठक अथवा दर्शक को स्वयं तय करने देने की आजादी देना  कि क्या सही और क्या गलत है? क्या प्रायोजित है और क्या न्यायोचित है? मोटे तौर पर मीडिया का एक बड़ा वर्ग आज भी इसी दायित्वबोध बंधा है। क्योंकि उसे मालूम है कि भरोसे की यही ईंट अगर खिसक जाएगी तो स्वयं मीडिया कहां रहेगा। जहां तक प्रिंट मीडिया का सवाल है तो उसने आपात काल जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी प्रतिबद्धता को कायम रखा है। आज इलेक्ट्राॅनिक मीडिया और कुछ हद तक सोशल मीडिया इसी भूमिका को आगे बढ़ा रहा है।  

मूल रूप में मीडिया का मूल्यबोध भी वही है, जो समाज का मूल्यबोध है। समाज को भी स्वस्थ, प्रामाणिक और पारदर्शी होने की दरकार है। ऐसा समाज ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। विश्व का नेतृत्व कर सकता है। तानाशाही वाले देशों में भी कहने को मीडिया है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता का नहीं के बराबर है। स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया की यह पहली जिम्मेदारी है कि किसी खास एजेंडे का भोंपू न बने। उसका कोई एजेंडा हो भी तो यही कि जनता का उसपर विश्वास कायम रहे। मीडिया अगर गलत, अर्द्धसत्य से प्रेरित अथवा एकांगी खबरें देगा तो समाज में भ्रम फैलेगा, विवाद बढ़ेंगे, उसमें बिखराव होगा। बेशक आज राजनीति समाज को नियं‍त्रित और संचालित करने वाली मुख्‍य धुरी है। उसे समाज से अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन मीडिया को राजनीति का टूल कितना और किस सीमा तक बनना चाहिए, यह भी तय करना होगा।

मीडिया का एक और स्थायी मूल्यबोध है मानवीय संवेदना को कायम रखना। यह मूल्य अभी भी अक्षुण्ण है। कभी कभी फेक न्यूज की आड़ में एकांगी समाचारकथाएं भी खड़ी की जाती हैं, जिन पर रोक लगनी चाहिए। इसके अलावा महिलाअों का सम्मान, प्रतिभाअों और समा के कमजोर वर्गों के साथ न्याय, राजनीति अगर पथ भ्रष्ट हो तो उसके कान उमेठने का साहस और मीडिया की भीतरी बुराइयों को बेहिचक स्वीकार के साथ उनमें सुधार की आंतरिक कोशिश भी मीडिया के मूल्यबोध का अहम हिस्सा होना चाहिए। 

उल्लेखनीय है कि मीडिया और समाज के मूल्यबोध का यह द्वंद्व दो दशक पहले तक ज्यादा इसलिए नहीं था, क्योंकि मुख्य धारा का मीडिया प्रिंट मीडिया ही था। उसने अपनी मर्यादाएं और आक्रामकताएं स्वयं निर्धारित की थीं। इसके बावजूद प्रेस कौंसिल जैसी संवैधानिक संस्थाओं का उस पर अंकुश था। प्रिंट मीडिया के अलावा टीवी और रेडियो के रूप में सरकारी उपक्रम थे, जो अधिकृत सूचनाएं ही देते थे।

लेकिन आज मीडिया बहुआयामी होने से यहां कुछ अराजकता की स्थिति भी बन रही है। करीब 20 साल पहले निजी न्यूज चैनलों के आने से जहां सूचनाओं और खबरों की व्यापकता, विविधता बढ़ी, वही व्यावसायिकता भी धीरे-धीरे हावी होने लगी। पत्रकारीय मूल्यों के पुराने तटबंध टूटने लगे। एक दशक पहले आए सोशल मीडिया ने सूचनाओं की मर्यादाअों का व्याकरण ही बदल डाला। असंपादित, अमर्यादित और अनियंत्रित सूचनाअो के सैलाब ने प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के पारंपरिक मूल्यबोध को ही ध्वस्त कर दिया। इस सूचना तंत्र पर कोई लगाम इसलिए लगाना नहीं चाहता, क्योंकि एक तो इससे उन सोशल मीडिया प्लेटफार्मो की कमाई बाधित होती है, जो इन्हें संचालित करते हैं, दूसरे ऐसा कोई भी नियंत्रण सभी प्रकार के एजेंडों को बाधित कर सकता है। साथ ही सत्ताएं भी ऐसे मीडिया का अपने हित में उपयोग कर लेती हैं। निश्चय ही लोकतंत्र में व्यक्ति को अपनी बात कहने की आजादी होनी चाहिए, है भी, लेकिन अगर उसे लोकहित और समाजहित ही प्रभावित होता हो, उसपर अंकुश लगाना गलत नहीं है।

आजकल एक और ‘नया पत्रकारीय मूल्य’ भी चलन में है, जो सच्ची पत्रकारिता के लिए घातक है। इसे ‘अर्जित’ मीडिया कवरेज कहा जाता है। यह पैसे के बदले किया जाने वाला ‘प्रायोजित’ न्यूज कवरेज होता है, जो छपता न्यूज पेज पर ही है, लेकिन ‘न्यूज’ नहीं होता। इसका मकसद वास्तव में किसी ब्रांड, उत्पाद या बाजार के किसी विचार को प्रचारित करना होता है, जिससे वह पाठक या दर्शक के अवचेतन पर छा जाए। हारकप और ओ नील ने 2016 में 10 प्रमुख ब्रिटिश अखबारों में किए एक अध्ययन में पाया कि सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के वजह से समकालीन न्यूज वेल्यूज पारंपरिक न्यूज वेल्यूज में थोड़ा अंतर है। बल्कि पुराने मूल्यों में कुछ नए मूल्य और जुड़ गए हैं। खबरों के आधुनिक मूल्यों को उन्होंने इस तरह संयोजित किया।

एक्सक्लूसिविटी यानी एक्स्लूसिव खबरें बैड न्यूज या नकारात्मक प्रभाव पैदा करने वाली न्यू स्टोरीज।

कान्फ्लीक्ट ऐसी स्टोरीज जिससे कांट्रोवर्सी पैदा हो, बहस हो।

सर प्राइज ऐसी स्टोरीज जिससे लोग चौंके

आडियो विजुअल ऐसी स्टोरीज जिसमें  रोचक आ‍डियो और विजुअल्स  हों।

शेयरेबिलिटी ऐसी स्टोरीज जो सोशल मीडिया में शेयर की जा सके।

मनोरंजन सेक्स, खेल और हल्की फुल्की रोचक समाचार कथाएं।

ड्रामा ऐसी स्टोरीज, जिसमें नाटकीय तत्व हों, जैसे कि कोर्ट के मामले,  राहत कार्य, दुर्घटना आदि।

फालो अप विभिन्न् स्टोरीज के फालो अप्स

पावर एलीट शक्तिशाली लोगों के बारे में स्टोरीज, यथा कारपोरेट की हस्तियां, कारपोरेट संगठन।

प्रासंगिक विभिन्न देशों समूहों की संस्कृति, भूगोल आदि के बारे में जानकारी।

 मैग्नीट्यूड ऐसी समाचार कथाएं, जो बहुत से लोगों से जुड़ी हों, या अत्यंत विशिष्ट घटनाओं से सम्बन्धित हों।

सेलेब्रिटी मशहूर लोगों  के बारे में स्टोरीज

गुड न्यूज सकारात्मक समाचार कथाएं

समाचार संगठनों का एजेंडा ऐसी समाचार कथाएं, जो स्वयं समाचार संगठन के अपने एजेंडे को सूट करती हो।

आजकल मीडिया के मूल्यबोध में भी कुछ विरोधाभास दिखाई पड़ता है। यह विरोधाभास उन आग्रहों और दबावों के कारण है, जहां मीडिया का मकसद समाज को शिक्षित करने, उसे संसूचित करने के हटकर समाज को भ्रमित अथवा चयनित या अर्द्धसत्य से भरी जानकारियां देने पर केन्द्रित हो जाता है। कई संगठनों के मीडिया सेल आजकल सोशल मीडिया में इसी तरह की  प्रायोजित या पूर्वाग्रहित जानकारी फैलाने में लगे रहते हैं, जिससे देश या समाज का कितना नुकसान हो रहा है, इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं होता।

मीडिया के समकालीन मूल्यबोध पर यह चर्चा इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि मीडिया के मूल्यबोध को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीतिक चाशनी में लपेटने प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। हाल में हमने देखा कि कुछ मीडिया चैनलों ने टीआरपी की खातिर समाचार और सूचनाआ को इतना ट्विस्ट किया कि सच क्या है, समझना मुश्किल  हो गया। अब डिजीटल मीडिया में भी यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। साधारण खबरों को भी बिला वजह सनसनीखेज बनाकर पेश किया जाने लगा है ताकि वेबसाइट को किसी भी तरह हिट्स मिलें। यह मीडिया के माध्यम अर्थार्जन की अंधी दौड़ है। जिसे प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि यही जारी रहा तो मीडिया में सबसे पहले जिस तत्व की हत्या होगी तो वह मूल्य बोध है। दुर्भाग्य से आज आर्थिक मूल्य बोध को नैतिक मूल्य बोध के ऊपर रखकर देखने की कोशिश की जा रही है। यह समूची पत्रकारिता के लिए ही घातक स्थिति है। मूल्यबोध ही खत्म हो जाएगा तो जिस विश्वसनीयता की बुनियाद पर मीडिया का पिरामिड खडा है, वही भरभरा जाएगा। भले की इससे पैसा कमाने की कुछ लोगों की आकांक्षा भले पूरी हो जाए।

अंग्रेजी के जाने-माने पत्रकार विनोद के जोस ने पिछले दिनो एक मीडिया संस्थान के दीक्षांत समारोह में दिए अपने भाषण में प्रख्‍यात अमेरिकी पत्रकार जोसेफ पुलित्जर के हवाले से कहा था- पत्रकार कोई बिजनेस मैनेजर, प्रकाशक या संस्थान का मालिक नहीं है। पत्रकार राज्यरूपी जहाज पर खड़ा एक पहरेदार है, जो समुद्र में दूर-दूर तक हर संभावित छोटे-बड़े खतरे पर नजर रखता है। वह लहरों में बह रहे उन डूबतों पर भी नजर रखता है, जिन्हें बचाया जा सकता है। वह धुंध और तूफान के परे छिपे खतरों के बारे में भी आगाह करता है। उस समय वह अपनी पगार या अपने मालिकों के मुनाफे के बारे में नहीं सोच रहा होता। वह वहां उन लोगों की सुरक्षा और भले के लिए होता है, जो उस पर भरोसा करते हैं। आज अगर पत्रकारिता के मूल्यबोध पर बहस हो रही है तो इसकी वजह यह है कि मीडिया में ऐसे बहुत से लोग आ गए हैं, जिनकी प्रतिबद्धता मीडिया को लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में कम अन्य‍ हितों की पूर्ति के माध्यम की शक्ल में ज्यादा है। मीडिया भी उनके कई व्यवसायों में से एक है। और जब व्यावसायिक हित ही सर्वोपरि होने लगते हैं तब स्वयं मीडिया भी सत्ता से सवाल पूछने का साहस खोने लगता है। उसका नैतिक बल रिसने लगता है। जबकि यही उसके मूल्यबोध की असल परीक्षा है। हमे नहीं भूलना चाहिए कि तात्कालिक दृष्टि से निजी अथवा व्यावसायिक‍ स्वार्थों के लिए हम मूल्यबोध को अंधेरे लाॅकर में डालकर खुश हो लें। लेकिन आने वाला वक्त और पीढि़यां हमसे सवाल करेंगी कि कठिन समय और चुनौतियों के वक्त आपका मूल्यबोध क्या था, कहा था? क्योंकि जो हम लिख रहे हैं, सोच रहे हैं और दिखा रहे हैं, वह भी इतिहास में दर्ज हो रहा है। हम वर्तमान को झांसा दे सकते हैं, लेकिन इतिहास को नहीं दे सकते।

(लेखक भोपाल से प्रकाशित समाचार पत्र ‘सुबह सवेरे’ में वरिष्ठ संपादक हैं।)

 

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