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विमर्श

मीडिया के बदलते मानदंड और आज के संदर्भ


- आशीष जैन

मूल्य शाश्वत अवश्य होते हैं, किंतु उन मूल्यों के लिए खड़ा होने वाला भी तो चाहिए। आज की पत्रकारिता ऐसे ही सवालों से जूझ रही है। आज व्यावसायिक सफलता और चर्चा में बने रहना सबसे बड़ा मूल्य है। हिन्दी के पहले समाचारपत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन हुआ तो उसका ध्येय वाक्य था- ‘हिंदुस्थानियों के हित का हेत’। इस वाक्य में भारत की पत्रकारिता का मूल्यबोध स्पष्ट  है। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं कि किसी भी राष्ट्र की नब्ज को मीडिया से टटोला जा सकता है। पिछले दो दशकों में अख़बारों की परवरिश और परिवेश दोनों बहुत बदल गए हैं। आज मीडिया मूल्यों के संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। पत्रकारिता जो कभी एक मिशन हुआ करती थी, अब कारोबार है। पहले नैतिक मूल्य मीडिया में भी थे और राजनीति में भी। आज जो संदर्भ हैं वे कल  होंगे या नहीं यह भी नहीं कह सकते, लेकिन बदलते सन्दर्भों का मूल्य क्या होगा, इस बात पर विचार जरूर होते रहना चाहिए। मीडिया के सामने जिन सामाजिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने की चुनौती है, उसमें लोकतंत्र के बाकी स्तम्भों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र के बाकी स्तम्भ जहां भी भटकते दिखाई दें, वहां उन्हें चेताने का काम मीडिया को करना चाहिए।

हमारे देश का दुर्भाग्य है दर्शक जिसे जो दिखाया जाता है उसे अस्वीकृत करने की स्थिति में नहीं रहता, वह दृश्य हो या खबर, बल्कि वह हमारे पूरे मस्तिष्क को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। आधुनिक तकनीक से सजा मीडिया किसी खूबसूरत आधुनिक मंडी की तरह हमारे सामने है, जिसमें सभी केवल अपने-अपने ग्राहक तलाश रहे हैं। मीडिया के विविध रूपों में शुमार ग्लोबल मीडिया कहें या राष्ट्रीय या क्षेत्रीय, सभी सामाजिक चेतना के बजाय अपने अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। जिन मानदडों की नींव पर मीडिया की विश्वसनीयता टिकी थी, उसके संदर्भ ही बदल गए। आज के सन्दर्भ भी कल रहेंगे या नहीं, हम कह नहीं सकते, लेकिन उन आदर्शों का क्या, उन मूल्यों का क्या, जिनसे होकर ही मीडिया पथ चिन्हित होता रहा है। आज वर्चुअल रिएलिटी ने बहुत कुछ सम्भव बना दिया है। सूचनाएं सुपर हाईवे बनकर अपने गंतव्य तक पहुंच रही हैं, लेकिन विचारों का विनिमय अपनी गुणवत्ता खो रहा है। बल्कि 21वीं सदी में जिसे उत्कर्ष काल में होना चाहिए, अपने पतन की राह बना रहा है। ऐसे में मूल्यानुगत मीडिया पर विमर्श ही नहीं, पर्याप्त नैतिक हस्तक्षेप भी जरुरी है।

यह भी सही है कि हमारे आदर्श और सिद्धांत सदैव एक समान नहीं रह सकते हैं, क्योंकि देशकाल और परिस्थितियां सदैव एक सी नहीं रहती। लेकिन परिवर्तन के नाम पर मीडिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में जातिवाद, धार्मिकता और लिंग भेद जैसे विषय मुद्दे बनकर उठने लगे हैं। घटनाओं, समस्याओं को एंगल बनाकर परोसने का चलन इन दिनों बढ़ा है, जिनका सामाजिक व्यवस्था में कोई स्वस्थ्य योगदान नहीं दिखाई देता है। केवल एक दूसरे को गिराने, उठाने और अपने वर्चस्व को साधने के अतिरक्त मीडिया का कोई ध्येय नहीं दिखाई देता। समूचा मीडिया आवारा पूंजी और मुनाफाखोरों की मुट्ठी में आ गया है। दुर्भाग्य से इन मानवीय सरोकारों को आहत करने वालों में देश का चौथा स्तम्भ भी है, यह दुखद ही है। अपराधी को ग्लैमर तत्व की तरह दिखाया जाना मीडिया की गुणात्मक क्षमता का पैरामीटर हो गया। पर्दे की हिंसा कब पर्दे के पीछे रहते हुए समाज में आदर्श स्थापित कर देती है, खुद मीडिया को पता नहीं चलता। मीडिया मूल्यों के संक्रमण के जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें जरूरी है परम्परागत मूल्यों से नये मूल्य पुनर्सृजित करते हुए उसकी विश्वसनीयता और सामाजिक उपादेयता तटस्थ रहे। हम बेहतर समझते हैं कि बिना नैतिक मूल्यों के सभ्य समाज की कल्पना ही सम्भव नहीं, तो मीडिया इस तथ्य से कैसे अछूता रह सकता है। चकाचौंध भरे पलभर के कवरेज में विचार, चिंतन, प्रश्न और गंभीरता सिरे से गायब है। सब जगह चीख पुकार मची है। कीचड़ से सने राजनीति के मैदान में मीडिया भी सहभागी की भूमिका निभा रहा है। निष्पक्षता जनपक्षधरता दूर दूर तक नहीं है।

राममनोहर लोहिया का कथन उल्लेखनीय है उन्होंने कहा था --''लोकराज लोकलाज से चलता है। '' लेकिन इन दिनों जिस तरह से लोक लाज की सीमाएं तोड़ी जा रही हैं, मूल्यानुगत मीडिया दिखाई नहीं पड़ता। जबकि मीडिया बौद्धिक होने के साथ ही सचेतन सामाजिक हस्तक्षेप का वाहक रहा है, लेकिन आज व्यावसायिक हितों की होड़ ने मीडिया के मूल्यबोध को क्षति पहुंचाई है। जबकि पत्रकारिता एक ध्येय निष्ठ उपक्रम है। जब हम पत्रकारिता में अपने स्वार्थ साधते हैं, तो मीडिया के मूल्यों का क्षरण होता है।  यह दौर उसी क्षरण से गुजर रहा है। उस पर होता भाषा का शीलहरण, मीडिया शब्दों की सारी सीमाओं को पार कर चुका है। एक समय था जब मीडिया की पहचान उसकी शैली और शब्दावली ही हुआ करती थी, जिसका पतन बहुत पहले ही माना जा चुका है। व्यंग्य की जगह गालियों ने ले ली है। असहमति विरोध से गुजरते हुए विद्रोह और शत्रुता में बदल गई है। भले ही झंडे अलग -अलग हैं, पर आचरण लगभग सभी का एक सा है। पिछले दशकों में जिस तरह से पारम्परिक मीडिया के साथ सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपना वर्चस्व स्थापित किया है, जितनी सक्रियता से किया है, इतनी ही सक्रियता से उसका औचित्य और अवधारणाएं बदली हैं। पेड न्यूज, फेक न्यूज और आचरण संहिता का उल्लंघन फैशन की तरह ही नहीं, बल्कि अपने बलशाली होने का भी प्रमाण बन रहा है। इन बड़े, पुराने और स्थापित बिकाऊ मीडिया हाउस के ख़िलाफ़ मोर्चा संभालने वाला कोई नहीं। राजनीतिक प्रतिनिधित्वकर्ता इनकी खबरों का श्रृंगार करते हैं, जिससे इनका बाजार सजता है। इनके विरोध में लिखना या गलत के विरोध में लिखना बेमानी नहीं, संबंधों के निर्वहन का हिस्सा है। ऐसे में मूल्यों की बात किससे की जाए, जबकि वे खुद बिके हुए हैं|

भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत पुरानी हैं, ऐसा माना जाता है। कुछ अध्ययन शास्त्री यह भी मानते हैं कि यह लोकतंत्र भी भारत में आयातित है। लेकिन आजादी के बाद की लहर ने बहुत कुछ बदला। पुरानी जड़ें सींचीं गईं, तो समयानुरूप पत्ते झड़े भी। पर जड़ों के सींचने का क्रम टूटता सा जा रहा है। सम्भवतः इसलिए आजकल वट वृक्ष की जगह महंगे बोनसाई का चलन बढ़ रहा है। यही लोकतंत्र की स्थिति है। मीडिया नेताओं की भक्ति भाजक होने की भूमिका निभा रहा है। व्यवस्था के खिलाफ उठती आवाज को दबा देना कोई बड़ी बात नहीं है। पत्रकारिता राजनीति की दलाल बनकर रह गई है। बाजारवाद के दौर में पेड न्यूज कोई बड़ी घटना नहीं है। उसके वर्तमान स्वरुप ने इन दिनों जो नया आयाम निर्मित  किया। वह भी इस  दौर की पत्रकारिता की विसंगति है। विज्ञापन अपनी विशुद्धता के साथ चलकर आये तो कोई बात नहीं। चाल चलकर प्रसारित किये जा रहे विज्ञापन चर्चाओं में बने रहते हैं,  जिसमें कहानी दिखने में कुछ और होने में कुछ और वाला कथन चरितार्थ हो जाता है। पार्टी विशेष का महिमामंडन दरअसल में विज्ञापन की छद्मता को परिभाषित करता है। स्वस्थ्य पत्रकारिता और उसकी शुचिता दूरबीन से भी दिखाई नहीं देती। अख़बारों की प्रचार संख्या और न्यूज चैनलों की टीआर पी के मापदंड अब क्या रह गए हैं, यह सवाल बनकर ही रह गया है। प्रबुद्ध पाठक भी मसाला ख़बरों से प्रेरित नजर आते हैं। अंततः वह उन सन्दर्भों को स्वीकार भी कर लेते हैं, जो बदल रहे हैं, लेकिन वे एक स्वस्थ्य समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। जैसा और जो पाठक/दर्शकों को परोसा जाता है, वैसा और वो आचमनी के जल की तरह ग्रहण कर रहे हैं। समाचारों को अस्वीकृति देना या उनका विरोध करने का अधिकार पाठक/दर्शकों  के पास सदैव सुरक्षित है। लेकिन बदलते संदर्भों में यह अस्वीकृति कहीं दर्ज नहीं होती। घटना किसी किशोरी के बलात्कार की हो या व्यवस्था के कुप्रबंधन की, बात को राजनीतिक तूल देकर दल विशेष की असफलता का मुद्दा बनाकर सामाजिक सरोकारों से दूर कर दिये जाने की खानापूर्ति पत्रकारिता बन गई है। खबरें पढ़कर पाठकों की आंखें अब नम नहीं होती, उनकी चेतना विकसित नहीं होती वह केवल किसी गली मोहल्ले या देश में घटित हुई घटना की सूचना से अधिक कुछ नहीं। उस सूचना को प्रसारित करने का उद्देश्य सामाजिक सरोकार न होते हुए दलगत राजनीति को गिराने उठाने का दूषित उपक्रम ही होता है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश के बाद मीडिया बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ रहा है। फलस्वरूप मीडिया के मूल्य और आदर्श पूंजी के बल पर स्वार्थ सिद्धि जैसे उद्देश्यों की खाना पूर्ति कर रहे हैं।

ब्रांडिंग का तमगा लटकाकर पाठकों को खरीदने की कला में बड़े मीडिया हाउस पारंगत हैं। इस बात को स्वीकारते हुए कि विज्ञापन के सहारे ही उनकी आमदनी है। लेकिन उनका अस्तित्व पाठकों के बीच रहकर ही सुरक्षित है। इन दिनों  मीडिया के क्षेत्र में व्यवसायियों का सक्रिय हस्तक्षेप हो जाने से पेन तो पत्रकारों का है, लेकिन स्याही मालिक की हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्थिति सबसे दयनीय है। वह अपना समय विवादों में खर्च करने में लगी है। समाज की विसंगतियों को उठाना उसकी जवाबदारियों का हिस्सा नहीं रहा। कोई भी घटना घटित होते ही बिना किसी प्रामाणिक तथ्य के फेक न्यूज़ के रूप में  किसी सैलाब की तरह आती है। बाजारवाद से उपजी चुनौतियाँ सबसे बड़ा संकट है। इसमें निजी नैतिकता और व्यावसायिक नैतिकता एक बड़ा सवाल है। सोशल मीडिया का प्रभाव बल्कि बढ़ता वर्चस्व मीडिया आदर्श, सिद्धांतों और मूल्यों को दरकिनार करते हुए विमर्शकारों की दुनिया को दो हिस्सों में बांट रहा है। मीडिया के भाषाई सद्भाव पर पर्याप्त काम करना आज के संदर्भों में सबसे बड़ी जरूरत है।

अख़बार शासनिक व्यवस्था व जनसामान्य के बीच एक सेतु की भूमिका निभाते हैं। दुर्भाग्य से यह सेतु अब ढह गया है। मूल्यों के ह्रास के साथ इस वजह को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि शासन की खामियों को जब-जब किसी अख़बार ने सामने लाने की कोशिश की ,विरोधों के ताप झेलते हुए प्रतिबन्ध की नीतियों का सामना करना पड़ा। सम्पादकों को जेल हुई तो किसी के प्रकाशन को बंद किया गया। पत्रकारिता के इतिहास में यह नया उपक्रम नहीं था, बल्कि उसके मूल्यानुगत होने का प्रमाण भी था। कुछ महत्वपूर्ण तथ्य गंभीर हस्तक्षेप की मांग करते हैं, जिनमें मीडिया अपने नैसर्गिक मूल्यों को बरक़रार रखने में असफल हो रहा है। लोकतंत्र का महापर्व चुनाव एक ऐसा ही बड़ा विषय है, जिसमें राजनीतिक पार्टियां, मीडिया से हाथ मिलाकर उन सूचनाओं पर शिकंजा कसने पर आमाद रहती हैं, जिनके आधार पर जनमत तैयार होता है। आज की मीडिया जनता की प्रवक्ता नहीं, राजनीतिक पार्टियों का भोपूं है, जिसे बजने से रोकने वाला कोई नहीं। खबरिया चैनलों की देखा देखी में कुछ अख़बार भी भटक गए हैं। बहस, मुद्दों और ओपिनियन पोल जैसी चोंचलेबाजी में फंसते अखबार अपने मूल से ही भटक गए हैं। इतना ही नहीं कुछ तथाकथित बड़े अख़बारों ने (प्रसार संख्या में केवल) इस तरह की घोषणाएँ भी प्रकाशित की थी ''अगर आपको अख़बार में प्रकाशित किसी खबर या रिपोर्टर की निष्पक्षता पर संदेह है, तो हमें जरूर बताइएगा।'' जिसे कई जगह संदर्भित किया गया इस घोषणा ने एक बड़ा कोलाहल मचा दिया और तब होड़ मची खुद को पाक -साफ़ दिखाने  और  दूसरे को नीचे गिराने की, लेकिन इसमें गिरी मीडिया की साख ही। दरअसल खेमे में बट चुके मीडिया में अब विचारधाराओं की लड़ाई भी एक व्यापक विस्तार ले रही है। व्यक्तिगत होकर आरोप प्रत्यारोपों का गढ़ बन रहे मीडिया में नैतिकता सिरे से गायब हो रही है। सोशल साइट्स हो या खबरिया चैनल्स, सब एक सुर में सुर मिलाते हैं, जो कर्कश ही हैं।

बहरहाल हमें याद रखना होगा मीडिया के इतिहास में इमरजेंसी के काले अध्याय के इतिहास के बावजूद वह मजबूत होकर उभरा है। लेकिन आज उसकी जड़ें कमजोर पड़ रही हैं। इस उम्मीद के साथ कि पत्रकारिता में मूल्यों का युग लौटेगा। अंततः पाठक ही उसका अस्तित्व बचाएं रख सकते हैं। यह भी जरुरी है कि पेड न्यूज के बहाने भ्रष्टाचार अपराध को ढांकने वाले अख़बारों को दण्डित किया जाय। यहां महात्मा गांधी का कथन उल्लेखनीय है कि,''पत्रकारिता का सच्चा कार्य जनता के दिमाग को शिक्षित करना है न कि इच्छित और अवांछित छापों के साथ इसे प्रभावित करना।''यही पत्रकारिता के मूल्यों का मूल स्वर है। अंततः हमें ही पत्रकारिता के भविष्य का निर्धारण करना है, हम कौन से आयाम गढ़ रहें हैं, जिस पर कभी कोई चल पायेगा। अपने पीछे हम कौन सी विरासत छोड़ कर जा रहे हैं, जिससे भावी पीढ़ी इस बात का निर्धारण कर सके कि उन्हें पत्रकारिता की कौन सी कसौटी पर खरा उतरना है। अंततः हमें याद रखना होगा हम धर्मवीर भारती, रामनाथ गोयनका, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी जैसे सम्पादकों की पीढ़ी के वाहक हैं। हमें न सिर्फ पत्रकारिता को कलंकित करने वाले तत्वों पर काम करना होगा, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर कुठारघात होने से रोकना होगा। यही मीडिया का नैतिक दायित्व है, जिसकी अपेक्षा उससे की जाती रही है।

(लेखक इंदौर से प्रकाशित समाचार पत्र 'अग्निधर्मा' के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं।)

 

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