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विमर्श

मीडिया का नीतिशास्त्र और नीतिबद्ध मीडिया


- डॉ. सी. जय शंकर बाबु

नीतिशास्त्र का जितना सैद्धांतिक महत्व है उतना ही व्यावहारिक। सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत व्यष्टि हित की जगह समष्टि हित (जिसमें व्यष्टि हित अपने आप शामिल है) की यानी लोक कल्याण की भावना का महत्व होता है, जिसको लागू हर व्यक्ति अपने स्वविवेक से करते हैं। नीतिशास्त्र सही मायने में आचरण का विज्ञान है।

नीतिबद्ध मीडिया भारतीयता की पहचान है। भारतीय सांस्कृतिक गरिमा और प्रतिष्ठा में मीडिया की मूल्यबद्धता एक महत्वपूर्ण पहलू है। मीडिया के नीतिशास्त्र रचने का काम किसी को अपने हाथ में लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। आत्मनुशासित मीडिया का मानक व्यवहार ही मीडिया के नीतिशास्त्र के रूप में सिद्ध हो सकता है। तभी मीडिया का मूल्यबोध और मीडिया का नैतिक धर्म पंचमवेद के बराबर प्रतिष्ठा हासिल कर सकते हैं। मीडिया की भूमिका ‘प्रहरी’ की है। ऐसी प्रहरी से ईमानदारी, निष्पक्षता की अपेक्षा निश्चित रूप से की जाती है। तभी मीडिया पर जन-विश्वास बढ़ेगा।

प्रेस परिषद द्वारा जारी ‘पत्रकारिता के आचरण के मानक’ (संस्करण 2019) में ‘पत्रकारिता में अच्छे आचरण’ प्रकरण में दो ही बातें हैं जो मीडिया के सदाचार के सार को स्पष्ट करती हैं। “1. अस्पष्ट प्रकृति की गलती को पत्रकारिता की आचार संहिता का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता। हालांकि, केवल त्रुटि को सही करने की जरूरत होगी। 2. बड़े संपादक अपने साथ रबड़ रखते हैं और कोई गलती बताये जाने पर उसे हटाने में हिचकिचाते नहीं हैं।”

मूल्यबद्धता से ही पत्रकारिता का उद्भव

पत्रकारिता का उदय जनतंत्रात्मक दृष्टि के उद्भव का ही परिणाम है। जनतंत्रात्मक समाज व्यवस्था का मूल उद्देश्य लोक मंगल की साधना है। ‘जन’शब्द व्यष्टि का नहीं, समष्टि का पर्याय है। इसमें जन-समाज के अंतर्गत व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी शामिल है। मानववादी दृष्टि से मानवीय समाज के विकास में, जनतंत्रात्मक समाज का जितना महत्व है, जनतंत्रात्मक शासन प्रणाली का भी उतना ही महत्व है।

व्यक्ति के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय, स्वतंत्रता, समता, सम्मान सुनिश्चित होने के लिए जनतंत्रात्मक शासन प्रणाली की परिकल्पना हुई है। रामराज्य के सापेक्ष में राजनीतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए विकसित तंत्र के रूप में जनतंत्रात्मक शासन प्रणाली के मूल्यों की रक्षा आवश्यक है। यह व्यक्ति के स्तर पर समाज-व्यवस्था के लिए अपेक्षित आदर्श व्यवहार के रूप में; समाज के स्तर पर सुव्यवस्था के रूप में सुनिश्चित होने के लिए जिस तंत्र का विकास हुआ, वह ‘पत्रकारिता’ की संज्ञा से अभिहित हुई है।

प्रजातंत्र में पत्रकारिता की बड़ी हितकारी भूमिका होती है। शासन व्यवस्था और जनता के बीच समन्वय की भूमिका में, अन्याय, अत्याचार, दमन, स्वेच्छा के अभाव की स्थिति में जनपक्षधरता के साथ जनचेतना के विकास में पत्रकारिता की जो भूमिका होती है, उसे असंख्य चिंतकों ने अपनी वाणी के माध्यम से समय-समय पर स्पष्ट की है। उसी क्रम में बर्के ने ‘चतुर्थ स्तंभ’ की परिकल्पना की है। जनतंत्र में तीन स्तंभों के रूप में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका के साथ एक अनिवार्य व्यवस्था के रूप में पत्रकारिता की भूमिका ‘चौथे स्तंभ’ की है, जो जनतंत्रात्मक प्रणाली रूपी भवन के खड़े होने में अन्य तीनों तंत्रों के अनुरूप में महत्वपूर्ण है।

जनतंत्रात्मक प्रणाली में जनचेतना के आधार-स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित पत्रकारिता को ‘प्रेस’ के रूप में विशिष्ट हैसियत हासिल था। वैज्ञानिक आविष्कारों के क्रम में कई साधनों का विकास हुआ है। रेडियो, टेलिविज़न, अंतर्जाल (इंटरनेट) के विकास क्रम में विश्व व्यापी जाल के विकास से संचार प्रणाली की अभूतपूर्व प्रगति हुई है।इलेक्ट्रॉनिक संचार व्यवस्था और साधनों के विकास के दौर में आविर्भूत संज्ञा ‘मीडिया’ का आज ज्यादा प्रचलन है। रेडियो, टीवी के अलावा वेब के लिए भी यह संज्ञा उचित और सार्थक प्रतीत होने लगी है। वेब के विकास और विस्तार के साथ आज नागरिक पत्रकारिता की अवधारणा भी विकसित हुई है जो काफ़ी सशक्त है।

मूल्यबोध ही मीडिया की आत्मा है

जनतंत्रात्मक गणतंत्र में मीडिया की अपनी भूमिका है। संचारकी गतिविधियों में और सूचना प्रसार के अलावा जनमत की तैयारी में निष्पक्षता ही मीडिया के महत्व को बढ़ा देता है। निष्पक्षता एक मूल्य है। कई मूल्यों से मीडिया के कार्य-व्यापार की नींव पड़ी थी। ऐसे मूल्यों के प्रति पूर्णप्रतिबद्धता ने मीडिया के प्रति जनविश्वास को कायम किया था। मूल्यबोध ही मीडिया की आत्मा है। मूल्यबद्ध व्यवहार ही समाज के प्रति उसकी सबसे बड़ी देन है।

सर्वजन कल्याण की सबल भावना की पृष्ठभूमि में ही पत्रकारिता का उदय हुआ था, अतः उसके उद्देश्यों की अभिव्यक्ति के लिए निम्नांकित सुख्यात् उक्तियाँ लागू हो सकती हैं –

“सर्वे संतु सुखिनः सर्वेसंतु निरामयः।

सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मा कश्चिद दुःख भाग्भवेत।।

तथा

“लोका समस्ता सुखिनोभवंतु”

भारत के संदर्भ में परतंत्रता के दौरान पत्रकारिता का उद्भव हुआ था। भारत में पत्रकारिता के जनक माने जाने वाले जेम्स अगस्टस हिक्की ईस्ट इंडिया कंपनी के आंतरिक मामलों से जुड़ा व्यक्ति ही था। कंपनी के अंदरूनी मामलों के भंडा-फोड़ के लिए उन्हें भले ही ‘देश-निकाला’ झेलना पड़ा, उनके द्वारा की गई गतिविधि एक तंत्र में रूप भारत में विकसित होने का मार्ग प्रशस्त हुआ। अंग्रेज़ों के लिए ‘बगल में भाल’ की भांति भूमिका निभाने, उनको उनींदा करने की भूमिका पत्रकारिता ने अपनी मूल्यबद्धता से ही निभाई थी।मूल्यबद्धता से ही हथियारों के मुकाबिल खड़े होने की ताकत उसमें विकसित हुई थी, तभी ख्यात शायर अकबर इलाहबादी ने कहा था –

“खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो।”

पराधीनता के समय अपने प्रासंगिक उद्भव से भारतीय पत्रकारिता ने जनता की भाव-लहरियों पर अप्रतिम प्रभाव दिखलाकर स्वाधीन चेतना को जागृति किया था। अपने प्रकाशकीय के पावन लक्ष्यों की घोषणा के साथ ही प्रतिबद्ध पत्रकारिता के आदर्श भूलने से भी भुलाए नहीं जाने वाले थे। साप्ताहिक ‘उदंत मार्तंड’ से हिंदी पत्रकारिता की नींव डालनेवाले पंडित जुगल किशोर अपने पत्र के मुख्य पृष्ठ पर संस्कृत की इन पंक्तियों को अंकित कर अपने आदर्श चेतना की घोषणा करते थे –

“दिवाकांत कांति विना ध्वांदमंतं

न चाप्नोति तद्वज्जगत्यज्ञ लोकः।

समाचार सेवामृते ज्ञत्वमाप्तं

न शक्नोति तस्मात्करोनीतियत्नं।।

असंख्य कर्मठ पत्रकारों से भारतीय पत्रकारिता के विशाल वटवृक्ष का विकास हुआ है।

त्याग, तपस्या, बलिदान, साहस, निष्ठा, प्रतिबद्धता जैसे मूल्यों के बल पर अंग्रेज़ों के विरोध में खड़े होकर हमने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी। देशी अख़बारों से उत्पन्न खतरों को झेलने के लिए वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट के अस्त्र का इस्तेमाल किया था अंग्रेज़ों ने। ख़तरे मोलकर भी कतराते नहीं थे उस समय के पत्रकार। मिशन भावना से समर्पित असंख्य पत्रकारों ने मीडिया के अपने मूल्य को निर्धारित कर दिया है। वे ख़तरे झेलने के लिए भी तैयार होते, मगर मूल्यों की प्रतिबद्धता से विचलित नहीं होते थे। भारतीय पत्रकारिता के गौरवपूर्ण इतिहास के संदर्भ में ‘स्वराज्य’ पत्र के संपादक पद भरने के लिए प्रकाशित एक विज्ञापन की चर्चा आती है–

“चाहिए स्वराज्य के लिए एक संपादक। वेतन – दो सूखी रोटियाँ, एक गिलास ठंडा पानी और प्रत्येक संपादकीय के लिए दस साल जेल और विशेष अवसर पे अपना सिर काटने के लिए तैयार, योग्य कलमकार।”

आज़ादी के लिए प्रतिबद्धतापूर्वक कलम की लड़ाई लड़कर शीश तक चढ़ाने वाले कलमकारों से सहजतः पत्रकारिता के मूल्य निर्धारित हुए थे। आज़ाद भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था से सुशासन का दौर बनने की जो आशा की गयी थी, उसमें पत्रकारिता की अपनी सुनिश्चित भूमिका की अपेक्षा थी। उसी संदर्भ में ‘चौथे खंभे’ की बातें आती हैं। पत्रकारिता से मीडिया तक के विकास में ‘सेवा’ से तब्दील होकर ‘व्यवसाय’ बनजाने और उसके साथ बड़ा आर्थिक तंत्र और मुनाफ़ा के उद्देश्य जुड़ने के साथ ही मूल्यों के ह्रास के आरोप हम अक्सर सुनते हैं। मीडिया का दायित्वबोध ही उसका मूल्यबोध भी है। वह स्वनिर्धारित है। मूल्यह्रास के लिए भी मीडिया स्वयं बाध्य है। इसके लिए व्यापारिक हितों से काम करने वालों को बाध्य ठहराया जाता है।

गौरवपूर्ण अतीत से विकसित भारतीय मीडिया के साथ कुछ विडंबनात्मक अवगुण जुड़ने की आलोचना आए दिन हम सुनते हैं। भूमंडलीकरण के दौर में, नव माध्यमों के विकास के साथ मुद्रित मीडिया के समक्ष उपस्थित चुनौतियाँ, दूसरी तरफ़ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बढ़त और कारोबार के आलोक में ये सारी विडंबनाएँ एक-एक कर जुड़ती गई हैं।

अवगुण चित ना धरो...

“एक नदिया एक नाल कहावत, मैलो नीर भरो |

जब मिलिके दोऊ एक बरन भये, सुरसरी नाम परो ||

प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो...

पत्रकारिता, प्रेस, मीडिया नाम कोई क्यों न हो, इसके साथ लोक मंगल का सबसे बड़ा दायित्व है। जनतंत्र की हृदय-वीणा पत्रकारिता है। इस हृदय-वीणा के सुर बद्ध मूल मंत्र जैसी रागिनियाँ बजने की जगह जब अपस्वर बजने लगेहैं, हमें मीडिया को अवगुणों से बचाना पड़ेगा। अतीत मेंवह बहती गंगा जैसी सुरसरी की गरिमा से विभूषित थी पत्रकारिता के रूप में। अब मीडिया कहलाकर कहीं की गंदगी आकर उसमें भर रही है। इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं? भूमंडलीकरण? निजीकरण? उदारीकरण? निहित स्वार्थपूर्ण व्यापारिक नीतियाँ व रीतियाँ?

पत्रकारिता, मीडिया की संज्ञाओं के साथ विकसित व्यवस्था, जनचेतना और जनतंत्रात्मक मूल्यों की रक्षाके उद्देश्य व प्रयासों के क्रम में विकसित होने के बावजूद कुछ विडंबनात्मक परिस्थितियों, स्वार्थी ताकतों की वजह से इस व्यवस्था में उपस्थित भटकाव की स्थिति कीउपस्थिति आलोचना सार्थक लगती है। गुणों के साथ अवगुण भी विकसित हो जाना इस आलोचना का कारण है। इन अवगुणों के निराकरण में विचार-विमर्श और सतर्कता से ही किसी हद तक आगे बढ़ना संभव है। उत्तर आधुनिक-विमर्शों के इस दौर में पत्रकारिता-मीडिया के विमर्श की भी बड़ी आवश्यकता है, जिससे इस विकसित तंत्र का सार्थक प्रयोजन सुनिश्चित हो सकता है।

समकालीन मीडिया विमर्श

भूमंडलीकरण, उदारीकरण, बाजारीकरण आदि के प्रभावग्रस्त दुनिया में पुरानी अवधारणाएं या तो बदल गई हैं या नई अवधारणाओं के रूप में विकसित व स्थापित हो रही हैं। पत्रकारिता किसी समय सेवा या मिशन की भावना से भरा कार्य हुआ करता था, जिसकी परिभाषा, शब्दावली आज लगभग बदल चुकी है। आज इस क्षेत्र को हम ‘मीडिया’ शब्द से पहचानते हैं। मीडिया के साथ आज मिशन की भावनालगभग गायब हो रही है। आज वह उपक्रमों, उद्योगों के रूप में विकसित हो रही है। बड़े पूंजीपति ही आज मीडिया के मालिक बन सकते हैं। पत्रकार, संपादक आज अपनी अहमियत खोते जा रहे हैं। उनकी भावनाओं, विचारों को मीडिया के क्षेत्र में आज कोई महत्व नहीं दिया जाता है। अथवा हम यूँ कह सकते हैं कि पत्रकार व संपादक को आज मालिकों (मीडिया में पूंजी लगानेवालों) के व्यापारिक उद्देश्यों, ग़लत नीतियों व बदतर लक्ष्यों का शिकार होना पड़ रहा है। समाचार लेखन, संपादन आदि पर भी ऐसे बुरे प्रभावों के आलोक में बुद्धिजीवी वर्ग मीडिया के रुख़, दिशा-दशा से क्षुब्ध नज़र आता है।

आज मुद्रित माध्यम (प्रिंट मीडिया) का जितना विकास हुआ है, उसके विकास की गति से चौगुना तेजी से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विकास व विस्तार हो रहा है। इंटर्नेट मीडिया या नई मीडिया का विस्तार व विकास की तेज़ी इन सबसे बढ़कर है। संचार-सेल्युलॉर सेवाओं के विस्तार और स्मॉर्ट फोन की नेट कनेक्टिविटी के साथ ही हर किसी की मुट्ठी तक नई मीडिया की पहुँच सुनिश्चित हो रही है। स्मॉर्ट फोन, इंटर्नेट सुविधायुक्त मोबाइल फोन धारकों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।

बाज़ारवाद के बढ़ते प्रभाव के दौर में पत्रकारिता पूंजीपतियों का व्यवसाय बन गया है। मीडिया के तमाम रूपों पर पैसों का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। जिन श्रमजिवियों ने पत्रकारिता को एक मिशन मानकर सेवा की दृष्टि से काम करना शुरू किया था उन्हें आज अस्तित्व संकट से गुज़रना पड़ रहा है। रोज़ी-रोटी के लिए आज वेतनभोगी बनकर उन्हें या तो पूंजीपतियों के इशारों पर नाचना पड़ रहा है या अपना नामो निशान मिटाना पड़ रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मीडिया कहीं अब एक बड़ा मायाजाल बनता जा रहा है और पत्रकारों को चाहे, अनचाहे चतुर जादूग़र बन जाने की विवशता है। किसी भी झूठ को सच के बराबर परोसना, उसी सच के माध्यम से मीडिया को मुनाफ़ा कमाने की मुहिम रचने में पूंजीपति तथा मीडिया घराने सफलता हासिल कर चुके हैं। पीत पत्रकारिता का आज एक नया रूप भी उभर आया है। कई कार्पोरेट घराने अपने कालेधन को सफ़ेद बनाने के सफल माध्यम के रूप में मीडिया पर दख़ल बना रहे हैं। इन्हें पत्रकारिता के मूल्यों से लेना देना नहीं है। समाचारपत्र और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से अधिकारीवर्ग, प्रतियोगी, छोटे-मोटे व्यापारियों पर कब्जा करते हुए बचने के लिए उन पर ग़लत स्टोरी रचने की नई पीत पत्रकारिता उभर आई है।

मीडिया का मूल्यबोध कैसे विकसित हो और कैसे स्थापित हो ?

मीडिया के साथ हमेशा ही मूल्यबोध जुड़ा है, इसमें कोई शक नहीं। अवगुणों की धारा बहने की गति पर रोक के लिए कई तंत्र विकसित हैं, वे सब मीडिया के अपने ही तंत्र हैं। स्वतंत्र मीडिया के लिए स्वनियमन ही महत्वपूर्ण मंत्र है। गांधीजी ने कहा था –

“पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य सेवा होना चाहिए। समाचारपत्र प्रेस एक महान शक्ति है। परंतु जिस प्रकार प्रचंड जल प्रवाह संपूर्ण क्षेत्र को जलमग्न कर देता है, और फसलों को उजाड़ देता है, इसी प्रकार अनियंत्रित कलम केवल विनाश ही करती है। सही नियंत्रण न रखने पर, यह नियंत्रण की आवश्यकता से अधिक विषैला सिद्ध होता है। यह केवल तभी लाभदायक हो सकता है जबकि सीमा में रहकर इसका इस्तेमाल किया जाए।”

गांधीजी का युग बीत चुका है। मगर मूल्यबद्धता युगीन सत्य नहीं शाश्वत सत्य है। नैतिकता गतिशीलता का भी पर्याय है। मूल्यों में परिवर्तन उनकी गतिशीलता है। मगर शाश्वत मूल्य शाश्वती से जुड़े मूल्य हैं। ये हमारे जन्म से, परंपरा से, संस्कृति भी से जुड़े हुए हैं। उनका विस्मरण व नज़रअंदाजी व्यवस्था के लिए ही ख़तरा है। नियमन का कार्य प्रहरी के मीडियाअप्रत्यक्ष रूप से ही करता है। शासन, सत्ता, कार्य-विधि सभी तंत्रों के आचरण के अप्रत्यक्ष नियमन में मीडिया की अमिट भूमिका है। ऐसे शक्तिशाली तंत्र को अपना मूलमंत्र नैतिक मूल्यबोध व व्यवहार के लिए प्रतिबद्ध होना निश्चय ही अपेक्षित है। यह नियमन किसी बाहरी तंत्र को करने की आवश्यकता नहीं है। नीतिशास्त्रीय दर्शन उसके अनुप्रयोग पर, आचरण पर टिका हुआ है। व्यावहारिक रूप से हर कदम नैतिकता का अनुपालन ही नीतिशास्त्र का सार है। ‘सर्वेजना सुखिनो भवंतु’की संकल्पना को साकार बनाने में इस नीतिबद्धता की अपेक्षित समाज-व्यवस्था व नियमन की भूमिका से जुड़ी मीडिया से निश्चय ही की जानी चाहिए।

भ्रष्टता को भव्यता प्रदान करने से मीडिया को बचना चाहिए। यह भ्रष्टता ‘पेड’, ‘फ़ेक’, ‘बेक’, ‘ब्रेकिंग’, ‘स्टिंग’, ‘रीज़नल’आदि कई रूपों में मीडिया को घेरने से जनजागृति, हितों की रक्षा जैसी अवधारणाओं के विस्मरण की नौबत आ रही है। हित पर-हित नहीं स्व-हित भी है। किसी ने सही कहा है कि स्वार्थपरता से बढ़कर मृत्यु नहीं है। मीडिया को अपने धर्म निभाने के लिए अपधर्म से मुक्त होने की आवश्यकता है।

कविवचन सुधा (186) का आदर्श वाक्य था –“अपधर्म छूटै, सत्व निज भारत है”। देश के प्रति सजगता, समाज-सुधार, राष्ट्रीय चेतना, मानवीयता, स्वाधीनता, सत्य, न्याय, कर्त्तव्य-निष्ठा, एकता की भावना आदि की दृष्टि से लोकजागरण की भूमिका निभाने वाले युग प्रवर्तक भारतेंदु के नाम से प्रकाशित भारतेंदु पत्र का आदर्श वाक्य था –“जग मंगल करै”। माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘प्रभा’ (1923) में यह अनुरोध प्रकाशित किया था –“हमारा अनुरोध है कि तुम अन्यायों, अत्याचारों और भूलों के संबंध में जो कुछ लिखना हो, वह दबकर नहीं खुलकर लिखो। तुम्हारे पत्रों कr विद्वता का ज्वर तभी शायद उतरेगा।”

मीडिया के मूल्य सरोकारों पर प्रश्न चिह्न का दौर खत्म हो

आज हर कदम पर मीडिया की बदचलनी पर लगाए जाने वाले आरोपों से मीडिया को बचाने की मुहिम छेड़ने की बड़ी आवश्यकता है। दुनिया को व्यवहार आदर्श बतानेवाले अख़बारों को खुद अपने इस संकट से मुक्त होने के लिए विश्वसनीय कार्रवाई करनी चाहिए।

मूल्यमंथन के इस दौर में पुराने मूल्यों की जगह लेते नए मूल्य किसी हद तक दूसरों के हितों, मुख्यतः जनहित के लिए सूक्ष्मरूप से ख़तरे के रूप में सिद्ध हो रहे हैं। मीडिया के स्वनियमन के लिए भारतीय प्रेस परिषद द्वारा जारी नीतिशास्त्र में लगभग कई सारी बातें सहजतः शामिल हो कई हैं। प्रबंधन बनाम पत्रकार, फूहड़ वाणिज्यीकरण के मुद्दों के समाधान हो जाने चाहिए। अश्लील, अशिष्ट अथवा जनता की सुमति के प्रतिकूल, अनैतिक धोखेपूर्ण विज्ञापनों के प्रकाशन से बचना चाहिए। नीतिशास्त्र मीडिया को कई रूपों में प्रबोधित करता है। नागरिक समाज के हितों की रक्षा, अपराधों से घृणा, जागृति, निष्कपट रिपोर्ट, सरकार व राजनीतिक दलों के आम संगठनों के प्रभाव में नहीं आना चाहिए। जनकल्याण की दृष्टि से दलित, शोषित, पीड़ित, गरीब, समाज में कमज़ोर वर्गों की पीड़ा आदि को प्रतिनिधित्व देने की सार्थक चेतना अख़बारों के साथ जुड़े, यह सदा अपेक्षित है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (स्वतंत्र मीडिया) यानी बोलने की आज़ादी भारत की जनता के लिए वरदान है। स्वीकृत नैतिक मूल्यों की रक्षा व पालन में मीडिया की प्रतिबद्धता अपेक्षित है।

नियमन-विनियमनके क्रम में स्थापित कुछ मानक

पत्रकारिता के क्षेत्र में जब विसंगतियाँ पाई गईं, तब स्वनियमन सुनिश्चित करने के लिए भारतीय प्रेस परिषद का गठन हो गया था। तभी से समय-समय पर ‘पत्रकारिता के लिए आचरण मानक’ भारतीय प्रेस परिषद द्वारा जारी किए जा रहे हैं। विगत एकाध वर्षों में लगातार वार्षिक संस्करणभी जारी किए गए हैं। पाँच भागों में विभक्त ये मानक क्रमशः ‘सिद्धांत और आचार नीति’, ‘विशिष्ट मुद्दों पर दिशा-निर्देश’, ‘प्रेस से संबंधित कानून’, ‘प्रेस परिषद के अधिकार’, ‘व्यवहार कर्म तथा प्रक्रियाएँ’ और ‘पत्रकारिता में अच्छे आचरण’ पर केंद्रित हैं। इसमें हर छोटी-बड़ी बातों सहित बड़ी स्पष्टता से मानक व दिशा-निर्देश शामिल हैं, जिनके आचरण से मीडिया अपने पूर्व वैभव को अवश्य ही हासिल कर सकताहै। ये मानक भारतीय प्रेस परिषद द्वारा निर्धारित होने पर भी मीडिया के स्वनियमन से संबद्ध आचरण हैं। नैतिक आदर्श के साथ व्यवहार नियम अपने आप बनाकर मनसा-वाचा-कर्मणा उनका अनुपालन करने पर वह स्वयं नीतिशास्त्र बन जाता है। इन पंक्तियों के लेखक का तेलुगु मीडिया में सेवाओं के दौरान अपना अनुभव है। तेलुगु के कुछ अख़बारों ने नशाबंदी के विरोध में आंदोलन को बल देते हुए संबंधित समाचारों के लिए विशेष परिशिष्ट भी प्रकाशित करने लगे थे। उन्हीं दिनों में अख़बारों ने यह तय किया था कि नशीले पदार्थों, शराब उत्पादों से संबंधित कोई विज्ञापन अख़बारों में प्रकाशित नहीं करेंगे। इससे अख़बारों के राजस्व को नुकसान हो रहा था।आंदोलन का अच्छा परिणाम यह हुआ कि सरकार को नशाबंदी लागू करने के लिए बाध्य होना पड़ा था। यद्यपि, कुछ ही समय बादनशाबंदी से राजस्व के घाटे से कताराकर आखिर सरकारों ने भी अपनी नीतियाँ पलट दीं, तथापि इन अख़बारों ने अपने व्यवहार के मानक को बनाए रखें। ऐसे आदर्श ही मीडिया के प्रति जन-विश्वास को बढ़ाने में सक्षम ही नहीं जनहित की भी गारंटी है।

अपने वैदिक मूल्यों से दुनिया को मूल्यबोध कराने में सक्षम भारत को अपने यहाँ विकसित मीडिया तंत्र से सदैव गर्व करने का अवसर तभी मिलेगा, जब मीडिया से जुड़े सभी हितभागी मानक व नैतिकताबद्ध व्यवहार के प्रतीक बन जाएंगे। जहाँ विडंबनाएँ हैं, वहाँ अवश्य हम सुधार की आशा करेंगे। मीडिया के मूल्यबोध की पुनरावृत्ति सबके हित में होगी।

(लेखक पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय, पुदुच्चेरी में हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

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