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सिर्फ एक दिन


- जया जादवानी

ये कहानी जब लिखी थी.. ये पता था कहानी क्या होती है ये कि लिखना क्या होता है? कोई बतानेसमझाने वाला था..लिखते ऐसे थे जैसे जुर्म कर रहे हों। बस अपनी तनहाई को बहलाने पढ़ालिखा करते थे। बचपन में ही शब्दों का हाथ जो पकड़ा, तो ये दोस्ती अब तक बरक़रार है..अब तो ये जान लेके भी मान नहीं रही।

तो ये पहली कहानी लिखकरहंसमें भेजी डरतेडरते, 'मनोरमा' में भी। जब मनोरमा में छप गई, तो लगभग : महीने बाद राजेन्द्र यादव का पत्र आया। उन्होंने कहानी की थोड़ी सी तारीफ करते हुए लिखा था कि मैं चाह कर भी गिरीश नाम के पात्र को अपने जेहन में खड़ा नहीं कर पा रहा। एक बार और सोच लो। ठीक कहा था उन्होंने। यह मैंने सोचा कहानी छपने के बाद। अब भी कुछ अधूराअधूरा सा लगता है। वह जूनून..वह दीवानापन, वह इंटेंसिटी उसमें नहीं है ... वह नज़र भीतर तक देख पाने की...गैर ज़रूरी भावुकता, नासमझी, उतावलापन, उथली रूमानियत...इतना कच्चापन...शायद मुझमें भी हो। कहानी भी तो पकने में उतना ही समय लेती है, जितना हम। जिंदगी के पत्थर पर खुद को धार देने में बहुत वक्त लगता है। यह तो बहुत बाद में पता चलता है। कुम्हार भी हम हैं..चाक भी हम और घड़ा भी।

उसने खिड़की की सींखचों से अपना चेहरा सटाया और तेज हवाओं के झोंके उसके चेहरे से टकराने लगे ..बाहर सब –कुछ अजनबी पर जाना पहचाना था ...विपरीत दिशा में भागते पेड़, मैदान, फसलें, जानवर, नदियाँ, पहाड़, खंभे .....ट्रेन किसी पुल के ऊपर से गुजरने लगी और अचानक डिब्बे में काफी शोर भर आया .उसने अंदर निगाह दौड़ाई ....अंदर भी उसका जाना पहचाना था ....चुहल करती उसकी सहेलियां, उसकी तीन टीचरें ,इधर–उधर बिखरा सामान ...पूरे डिब्बे में सब फैले हुए ....बेतरतीब .....अलसाये....कोई पढ़ रही है ...कोई हंस ...किसी की दरिया सरीखी लम्बी बातें तो कोई खामोश गुमसुम ...अपने आपमें सिमटी हुई .किसी को पता तक नहीं चला और उसका पूरा संसार बदल गया ....उसके होठों पर व्यंगात्मक मुस्कान आ गयी ...उसने अपना चेहरा छिपाने के लिये खिड़की की तरफ किया ही था कि अनीता सूद ने देख लिया ...

‘किसे याद करके मुस्करा रही है मेरी जान ...?’उसने चुटकी ली.

‘तुझे नहीं ....’वह अनमनी बाहर देखती रही.

‘अच्छा ....फिर कौन है वह ?’ फिर वह हँसते –हँसते गंभीर हो गयी..

‘क्या बात है ऋतु ...कहाँ है तू..?’

‘अनु...हर बार मै तुझे अपनी परेशानीयों में शामिल नहीं कर सकती ...तू मुझ तक हंसती हुई आती है ...हंसती हुई ही जा ...’ऋतु ने हँसते हुए उसके गाल थपथपा दिए.

‘ मै तुझ तक न हंसती हुई आना चाहती हूँ ...न जाना .ऋतु ..काश !मै तेरा खोया हुआ तुझे लौटा सकती...’

‘मेरे पास खोने को कुछ नहीं है...’ऋतु ने बेचारगी की मुद्रा में अपने हाथ फैला दिए.

‘यह जो तेरा अपना आप तुझसे खो गया है ...वह ....’

‘उसे खोकर मै खुश हूँ ....’ऋतु हंस दी ...बेबस हंसी ....यह कैसी हंसी थी ...घायल और तार –तार ...यह कुछ मिल जाये तो भर जाती ...न मिले तो रीती सी ...

‘तेरी इसी बात पर मै तुझे चाहती हूँ ...सच तू आखिर तू है ....’अनीता ने उसकी नाक पकड़ कर हिला दी ....’आ चल ताश खेंलें ...अकेली –अकेली मत रह ..’फिर वह अन्य सहेलियों की ओर मुड़ी ...’सुमन ,रोज़ी ,लिली ,कुसुम ,वीनू ...आओ ताश खेंलें ....’और सबने मिलकर जगह बनाई ,पेटियां जमाईं और खेल शुरू हो गया.

कितना अच्छा है सब कुछ भूल कर जीना ?ये लोग ,ये लड़कियां कितनी ख़ुशनसीब हैं ?किस तरह बेपरवाही से जीती हैं ?कितने मज़े से ?और एक वह है ....जीने के कितने अज़ब तरीके हैं उसके पास ? जिए तो एक पल जी ले ,न चाहे तो ऊपर से बरस गुज़र जाये ...वह सतह पर खामोश बैठी रहती है ...यह ख़ामोशी क्या है ?तटस्थता ...ख़ालीपन ...वैराग्य या भूकंप के पहले का सन्नाटा ....अपने बारे में लगातार सोचते हुए कई बार उसे लगता है ..वह बेहद आत्मकेन्द्रित होती जा रही है ..जो उसके अंदर के रचनाकार के लिये गलत है ...फिर भी कई बातें अनचाहे होतीं हैं ..आप कुछ नहीं कर सकते ...उसने उस क्षण खुद को अपने हाथों से निकल जाने दिया ....

दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन रुकी .स्टेशन की चकाचौंध से सब चमत्कृत तो थी ही पर ऋतु का दिल उछल कर उसके कंठ तक आ गया .हर बात में एक नया अर्थ था ..नया और गहरा ...कोई नहीं समझ सकता ,बस वही जानती थी ..रात के बारह बजे भी उसकी आँखें रौशनी से चकाचौंध क्यों है? क्यों यह भीषण शोर उसे मद्धिम संगीत लग रहा है? क्यों हर शख्स जैसे उसे ही देख रहा है? क्यों हवा में खुशबू घुल गयी है? क्यों? क्यों? कितने प्रश्नों के उत्तर वह देती?

उसने अन्य लड़कियों के साथ सामान उतारना शुरू कर दिया .फिर सभी ने अपना सामान स्वयं उठाया और टैक्सी स्टैंड की चल पड़ी तो जैसे सारा शहर ऋतु के स्वागत में मुस्करा दिया .नियोन लाइट्स जैसे पलट पलट कर उसे देख रही हैं ...आज वह कितनी खुश है ...कितनी उदास ...कितनी व्याकुल ..?

‘अनु ..यह शहर कितना खूबसूरत है ...सब कुछ है यहाँ ..सब कुछ ...’उसने अनु के कान में धीरे से कहा ...

‘हां ...सब कुछ है यहाँ ...बस तू नहीं है ...और अभी तूने इसकी ख़ूबसूरती देखी कहाँ है ....और ऋतु सिर्फ जगहें ही खूबसूरत नहीं होतीं ....लोग भी तो....’

‘हां....अनु ..कुछ लोग भी बड़े खूबसूरत होते हैं ...चाहे जिस तरह उन्हें देखो ...किसी भी कोण से ...’ऋतु कह कर शर्मा गयी .उसने अनु के कंधे पर मुंह छिपा लिया .

मंजिल तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने जाने कितनी बातें कर डालीं ...उन बातों से बचकर जिन्हें ऋतु कहना नहीं चाहती थी और अनु का आग्रह  नहीं था....मंजिल...ऋतु को सोचकर हंसी आ गयी .....जहाँ वह जा रही है ...,मंजिल तो नहीं ..हां पड़ाव ज़रूर है ..वह भी सिर्फ एक दिन का ....फिर वह आगे निकल जाएगी...पड़ाव पीछे रह जायेगा ...पड़ाव ?नहीं ऋतु उसे पड़ाव भी नहीं मानती ...फिर वह आगे किसके लिये चलेगी? अगली किसी मंजिल की तलाश में या सिर्फ इसलिए कि चलना सबकी नियति होती है ,उसकी भी ....

उसने अनीता की ओर देखा ...वह दिल्ली की ख़ूबसूरती देखने में व्यस्त थी ...यह अनु भी बड़ी प्यारी है .जो बता दो समझ जाएगी ..न बताने पर पर भी उसका कोई विशेष आग्रह नहीं होता था ....जानती थी ...ऋतु लौट कर उस तक ही आएगी ....यह जानना कभी –कभी बड़ा भयानक लगता था ऋतु को .उसने अपना आप हमेशा लोगों से ,परिवार से छुपा कर रखा था ...वह जिन्दगी को एक लम्बे शराब के घूँट की तरह पीती है और देर तक उसके तिक्तता भरे नशे में रहती है .कभी उस पर टिप्पणी कर देती है ,कभी उस पर हंस लेती है ..देखा जाये तो जीने का यही तरीका उसे माकूल लगता है.

वे रेस्ट हॉउस पहुंचे तो रात के दो बज चुके थे ..थकान सबके चेहरों पर हावी थी .सब सोना चाहतीं थी पर वह नहीं .उसे सुबह का इंतजार था .ऐसी सुबह जो उसके जीवन में सिर्फ एक बार आनी थी और फिर कोई सुप्रभात किसी ने नहीं गाना था.हर कमरे में चार –चार बिस्तर लगे थे ,चार –चार का ग्रुप बंट गया और सोने की तैयारी होने लगी.

ऋतु अपने बिस्तर पर लेटी बाहर देख रही है ...खिड़की के बाहर ..एक टुकड़ा चाँद ,विशाल आसमान और न जाने कितने तारे ...लॉन की हरी घास पर रौशनी का छिडकाव ...कल यह सब बदल जायेगा ..यह नहीं सिर्फ वह ...यह तो वहीँ रहेगा ...आज भी ...कल भी ....

कितनी जल्दी दो साल बीत गए और यह निर्णायक क्षण आ पहुंचा...ऋतु सोचने लगी ....उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वह अपना समूचा जीवन सिर्फ एक दिन को दे देगी ....फिर बाकी के सारे वर्ष वह क्या करेगी ?बस वह एक दिन जी ले ..अपने लिये ..अपनी ख़ुशी के लिये ..जैसे वह चाहती है ..वैसे ..बाकी के वर्ष चाहे उसे दूसरों के लिये जीने पड़ें ..वह जी लेगी ..उसी तरह ...इस एक दिन के सिवा है ही क्या उसके पास ...जीने को ...देने को ...?

उसे वे सारी पंक्तियाँ ठीक –ठीक तो याद नहीं ,जो उसने किसी पत्रिका में पढ़ी थीं ..पर कुछ लाइंस उसे अभी भी याद हैं .....

          ‘हवा/ पेड़ –पौधे /ज़मीन

         खुशबू /फूल /यादें /पहाड़ /कविता

          सपने /बातें /धूल

           तुम किसी एक को चुनो

           और रहो सारी उम्र साथ उसके

           शिकायत न करो ......’

उसने लेखक का नाम पढ़ा ...’गिरीश ‘.उसने उसे एक पत्र लिखा कि वह सिर्फ सपनों के साथ रह रही है बगैर शिकायत के .जवाब में गिरीश का पत्र आया था ..’मैं तो सिर्फ धूल के साथ रह रहा हूँ ..सपने कैसे होते हैं?’

ऋतु का मन हिल गया था ....इसकी धूल में यदि थोड़े से सपने मिल जांयें तो यह इसे इतनी चुभेगी नहीं .जब यही बात उसने गिरीश को लिखी तो उसका जवाब था ...’मुझे किसी के सपने उधार नहीं चाहिए ...मेरी आँखें उसे देख शर्मिंदा होंगीं .’तब अनचाहे ही ऋतु उसके लिये तड़फ उठी थी .और उस तड़फ का परिणाम था ...दो सालों तक खतों का अनवरत सिलसिला ...फोन ..लम्बी –लम्बी कवितायेँ और कुछेक फोटो .ऋतु को हर क्षण लगता इस आदमी से एक बार मिलना बेहद ज़रूरी है ,इसकी धूल में अपने सपनों के रंग भरने के लिये ...अनायास ही उसे अपनी स्वप्नशीलता चुभने लगी ...

ऋतु बिजनेसमैन बाप की इकलौती बेटी और गिरीश शादीशुदा .धरती –आसमान कभी नहीं मिलते ,दोनों जानते थे ...कैसे वे यह भूल कर बैठे जबकि जन्मजात कायरता दोनों में थी और बहुत सोचने के बाद ऋतु को लगा  ...अगर वह इसके साथ जिन्दगी नहीं बिता सकती तो एक दिन ...सिर्फ एक दिन वह इस शख्स के साथ जी ले ....कैसे भी ....कैसे भी ....उसकी धूल में अपने सपनों की महक भर दे ...उसे अपने सपनों का अछूतापन अखरने लगा.किसी ऐसे आदमी के साथ एक दिन जीना ,जिसे तुम बहुत प्यार करते हो ...सबसे बचाकर ..सबसे चुरा कर ...उस दिन को अपनी छाती से लगाकर ,बाकी की जिंदगी किसी के भी हवाले कर देना ..सबके बस की बात नहीं पर उसके थी ..और उसने अंतिम फैसला कर लिया .सारी जिंदगी न जीने से कहीं बेहतर था ...एक दिन जीना और उसने गिरीश को लिखा ...वह उसके साथ सिर्फ एक दिन जीना चाहती है ...उसके शहर दिल्ली में ...कैसे भी ...किसी भी तरह ..वह मना न करे .गिरीश न ‘हां’ कह सका न ‘न’.

ऋतु ने दिल्ली टूर की बात सहेलियों में चलायी और उनकी सहमति से प्रिंसिपल तक बात पहुंचाई गयी. दो महीनों बाद निर्णय ‘हां’ में लिया गया.ऋतु जानती थी सिर्फ इसी तरीके से वह गिरीश से मिल सकती है ...किसी और तरीके से नहीं.

कल गिरीश आएगा उसे लेने, उसने अपना पता लिख दिया था. दिल्ली में तीन दिन रहना था और वह पहला दिन गिरीश के साथ गुज़ारना चाहती थी. कैसा होगा वह? उसके कितने फोटो उसने देखे थे, पर फोटो देखने और वास्तव में देखने का फर्क वह जानती थी. विचारों से वे अजनबी नहीं थे फिर भी एक खास तरह का संकोच ऋतु के मन में अब भी था .संकोच...पछतावा नहीं ...वह उन लोगों में से नहीं थी जो आनन् फानन निर्णय ले लेते...फिर सिर धुनते थे.

और फिर आयी वह सुबह ...ऋतु के पोर –पोर को जिसका इंतजार था. करीब दस बजे गिरीश आ पहुंचा .उसने नीचे ऑफिस नुमा कमरे में अपना परिचय देकर ऋतु को बुलवाया. अपनी टीचर के साथ ऋतु धडकते ह्रदय से नीचे आयी ..गिरीश दूसरी टीचर से बातें कर रहा था. आहट हुई और उसने ऊपर देखा ...बादल के एक टुकड़े ने कसकर चाँद को गले लगा लिया. ऋतु अभी इसी क्षण इन आँखों के भूरे बादलों में खो जाएगी फिर कभी नहीं निकलेगी. जी कर रहा है अभी इसी क्षण इन बादलों को छू ले. आखिर गिरीश ही संभला. उसने ऋतु की टीचर मिसेज़ शुक्ला का अभिवादन किया और हाथो में लिये हुए फूल ऋतु की ओर बढाये....और ऋतु उसे लगा ..इसी वक्त इस शख्स की बांहों में झूल जाये. प्रलय का जो क्षण आना है अभी आ जाये ...अभी .वह इससे पहली बार मिली भी तो कहाँ? इतने लोगों के सामने .वह इस पल इसकी बाँहों में झूल नहीं सकती ..इसका माथा नहीं चूम सकती ...इसकी आँखे ..इसकी पलकें ,नाक ,उँगलियाँ ...होंठ ....ओ खुदाया! इस आवेग से मुझे बचा..

गिरीश ने टीचर से क्या कहा ...क्या बहाने बनाये ...वह नहीं जानती .उन दोनों का रचनाकार होना ही काम आया हो शायद .बस वह इतना जानती है ,गिरीश के साथ बाहर उसके स्कूटर के समीप खडी है. कितना प्यारा है यह ...? इसके बाल ,इसकी भौहें ,आखें ,ठोड़ी ,कुछ भी तो पराया नहीं है. ऋतु का मन किया इसके बाल बिखरा दे आगे बढकर फिर यह और भी खूबसूरत लगेगा ....गिरीश ने शायद उसके मन की बात समझ ली .उसकी नाक पकड़ कर हलके से हिला दी ...दोनों हंस दिए ...सारा संकोच बह गया.

गिरीश स्कूटर चला रहा है. वह उसकी पीठ से गाल सटाये,दोनों बांहें उसकी कमर में बांधे बैठी है...गिरीश उसे बता रहा है ..

‘देखो ...यह शहर बहुत खूबसूरत है .यहाँ की सड़कें ..बड़ी –बड़ी इमारतें ..यहाँ के लोग ...यहाँ की रेस जैसी जिन्दगी ....यहाँ की भव्यता ......’ यह क्या कहे जा रहे हो इडियट ...कुछ अपनी बात करो ...वह उसकी पीठ से गाल सटाये आँखें बंद किये बस जी रही है .खुदाया! यही जिंदगी है ..यही...जो मै तुमसे चाहती थी .जितनी देर मैं यह जी सकूँ ..यह पल ...यह क्षण ...यह दिन ...

‘ऋतु तुम बहुत अच्छी हो ...बहुत प्यारी ...’अचानक गिरीश ने कहा तो ऋतु चौंकी .फिर हंस पड़ी ....अच्छा, मैंने सोचा तुम खूबसूरत कहोगे.

‘ऋतु हम देर से मिले .तब जबकि हम फैसले लेने की स्थिति से गुज़र चुके थे. स्थिति ...स्थितियां क्या हमारी बनायीं हुई नहीं...? हम उन्हें बदल सकते थे पर हम कायर हैं. हम दूसरों के सोचने की इतनी अधिक पहवाह करते हैं कि ....’

‘कई बार हम अपने जीने का ढंग तक बदल देते हैं ..बदले में हमें क्या मिलता है?’ ऋतु ने तिक्त स्वर में कहा और उसकी आँखें भर आयीं ....नहीं ..आज नहीं रोना ....यह दिन तो तेरे जीने के लिये बना है ...रोने का क्या है ..सारी उम्र पड़ी है.’’सिर्फ एक दिन” गिरीश स्कूटर रोककर उसके करीब चला आया. उसके स्वर में जाने क्या था ,मजबूती से संभाला गया ऋतु का मन पिघलने लगा ..वह आगे बढ़ कर उससे लिपट गयी. गिरीश ने उसे कसकर अपनी छाती से लगा लिया ...और वह ....

जिन्दगी की सख्त पथरीली राहों से छोटे –छोटे सपने चुनने लगी ....छोटे छोटे सुख ..हल्के भूरे ,नर्म पंखों वाली चिड़िया की तरह ..जो नन्हें –नन्हें पंजों से एक हथेली से दूसरी तक फुदकती ...यह सुख है ..हां यही सुख है ..हल्का गर्म ..भूरा ..मुलायम ..रोंयेंदार ....इसकी गर्माहट हथेलियों से होती हुई अन्दर कहीं ज़ज्ब होती जाती है ..और यह सुख ...जिसे छुआ जा सकता है ,कसकर अपने गले लगाया जा सकता है, सारा दिन इसके साथ जिया जा सकता है.

बहुत देर बाद ऋतु कुछ चैतन्य हुई तो उसे याद आया ..गिरीश के साथ जाने कब वह इस होटल के कमरे में आ गयी थी और ..उसने करीब सो रहे गिरीश को प्यार से देखा और देर तक देखती रही .उसका चेहरा अपनी छाती से सटा बेतहाशा चूमा ...आँखें, नाक, माथा, गर्दन , होंठ, पलकें, ठोड़ी, कंधे. यह मुहब्बत भी कैसी मज़बूरी होती है? अपने अन्दर की सच्चाइयों के साथ, अपने महबूब के साथ एक दिन जीना, फिर बिछड़ जाना ...किसी को क्या मालूम आदमी कितना टूटता है? टूट कर कितना रोता है?

गिरीश तब तक जाग चुका था.उसने आँखे खोलकर एक पल ऋतु को देखा फिर उसके बालों में अपना चेहरा छुपा लिया. ऋतु ने घड़ी देखी ..पांच बज चुके थे ....

‘गिरीश....’उसने उसके कानों से अपने होंठ सटा लिये ....’देखो पांच बज गए ,मुझे सात बजे वापस पहुंचना है.’

‘पर अभी तो तुम कुछ घूमी ही नहीं ...लालकिला ,क़ुतुब मीनार ,जामा मस्जिद ,कनाट प्लेस और भी कितना कुछ ....’

‘वह सब मैंने देख लिया ...’ऋतु हंस दी ...’अब कुछ खिलाओ तो सही ..फीलिंग हंगरी ...’

‘अरे हां .....’गिरीश ने वेटर को बुलाने के लिये घंटी की तरफ हाथ बढाया ही था कि ऋतु ने उसका हाथ पकड़ लिया ...

‘यहाँ नहीं ...चलो तैयार होकर बाहर चलते हैं.’

गिरीश मान गया ..दोनों तैयार होकर बाहर आ गये ..कुछ खाया –पिया और सड़कों पर पैदल घुमते रहे ...हाथों में हाथ डाले . कितनी बातें थीं जिन्हें ऋतु कहना चाहती है ..कितने सवाल हैं जिनके जवाब उसके पास नहीं .उसके तो सारे प्रश्न ही अनुत्तरित थे ....

‘गिरीश ...मैं तुम्हारे साथ सारी उम्र क्यों नहीं चल सकती ...यूँ ही हाथों में हाथ डाले ...पैदल सड़कों पर घूमते हुए....’

‘गिरीश ...मेरी साँसों की लय तुम्हारी साँसों जैसी क्यों है ?’

‘ गिरीश ..मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनना चाहती हूँ ...’

‘गिरीश मै सारी उम्र तुम्हारी आँखों की रौशनी की पगडंडी पर क्यों नहीं चल सकती ...?’

‘गिरीश ...इन राहों पर कोई मोड़ क्यों नहीं है ...?’

‘गिरीश...यह जो एक दिन मैंने अपने जीवन का चुना है ,बाकी के दिन मैं क्या करुँगी ?’

वह  जानती है इसमें से किसी का भी जवाब गिरीश के पास नहीं है ..पर क्या उसके पास है ....?’

‘ऋतु ...’उसने सुना ...गिरीश कह रहा है ...’जी करता है ..पीछे न लौटूं ...ऐसे ही जीता जाऊं ...तुम्हें रोक लूँ ..न जाने दूँ ...जी लूँ तुम्हारे साथ ...जितना जी सकता हूँ ..भौतिक ज़रूरतें क्या मोहब्बत से बड़ी होतीं हैं ?सामाजिक प्रतिष्ठा ,सम्मान ..सफलता के प्रमाण पत्र हमारे लिये नहीं ,फिर हम क्यों वही सब चाहते हैं ?ऋतु सब कुछ रहेगा ..सिर्फ वही नहीं जो बीत गया.’

ऋतु चुपचाप उसके साथ चल रही है ...अपने आप में खोयी , .उसे सुनती,  भीगती हुई ..आसपास के माहौल से बेखबर ,गिरीश का हाथ कोमलता से थामे ...आसपास कितने मकान हैं ?कितने घर ?शाम हो रही है ...लोग घर लौट रहे हैं ...घर ?उसका तो कोई नहीं .वह किसका इंतजार करेगी ? शाम भी रोज़ होगी ..रात भी ..वह किसकी बांहों में यूँ झूला करेगी ?गिरीश को क्या कभी फिर मिल सकेगी?खुदाया !यह क्या कर डाला उसने ?एक दिन किसी को सौंप कर वह हर दिन से खाली हो गयी .उसके जीवन में सिर्फ एक बार ज्वार आना था फिर हमेशा के लिये रीत जाना था ....

उसे  लगा अभी कोई चमत्कार होगा और जादू के ज़ोर से उनके क़दमों के सामने एक घर खड़ा हो जायेगा. गिरीश शाम को घर लौटेगा ..वह बच्चों की सार–संभाल किया करेगी ....कमबख्त औरत ....!

‘ऋतु ..कुछ बोलो ना ...चुप क्यों हो?’ दोनों पता नहीं किस जगह खड़े हैं ...किन्ही फूलों और पेड़ों के बीच ...गिरीश वहीँ घास पर बैठ गया ...ऋतु को अपने पास खींचकर ...ऋतु पहले उसके कन्धों तक झुकी फिर उसकी गोद में सिर रखकर लेट गयी ...वह बहुत थकी लग रही है ..सचमुच थक गयी है या मानसिक संघर्ष के कारण ...गिरीश नहीं समझ पाया ...उसने ऋतु के चेहरे से बाल हटाये और उसका माथा चूम लिया. दो आंसू ऋतु की आँखों में आये ...जिन्हें छिपाने उसने लेटे –लेटे ही गिरीश की गर्दन में बांहें डाल दीं और आधी उठती हुई उसके सीने में अपना सिर छिपा लिया. पर क्या वह गिरीश से छिप सकती थी ?उसने उसके बालों को चूम लिया.

‘ऋतु ,मैं यह नहीं कहता कि तुमने मेरे साथ एक दिन बिताने का फैसला करके सही किया या गलत क्योंकि यह हद हम पार कर चुके हैं. मैं बावज़ूद तुम्हारे साहस के एक बात तुमसे पूछता हूँ .....यह दिन हमें खाली करेगा या भरेगा? मैं क्या जिन्दगी के बाकी दिन जी पाउँगा? तुम्हारी मुहब्बत जो मेरी नसों में भर गयी है, क्या मेरे सिर चढ़कर न बोलेगी? अभी तक तुम्हें चाहते हुए जीना कहीं अधिक आसान था पर तुम्हें पाने के बाद, तुमसे अलग होकर जीना क्या हम पर ज़ुल्म नहीं? ऋतु बोलो ना ...क्या कल के बाद के सारे दिन तुम उसी सहजता से जी लोगी?’

उसने ऋतु का चेहरा उठाकर अपने सामने कर लिया. आंसुओं को रोकने की कोशिश में उसका चेहरा बन-बिगड़ रहा है. किसी को बता दो तुम्हें सिर्फ आज जीना है, तो क्या वह अपनी सारी हसरतें एक दिन में पूरी करना न चाहेगा ?चाहेगा तो क्या जुर्म करेगा?

ऋतु ने उसके कंधे में अपना सिर छिपाते हुए कहा ...’गिरीश ...गिरीश मुझे अपने होटेल ले चलो ..अभी ..इसी वक्त .....’

‘चलो ...’गिरीश ने उसे सहारा देकर उठाया और अपने साथ ले लिया.

साढ़े सात बज चुके और उस कमरे में मोहब्बत सैलाब की तरह बह रही है ..बाढ़ तोड़ कर आयी नदी की मानिंद ....कोई सारी ज़िन्दगी का प्यार एक दिन में कैसे कर सकता है ?ऋतु नहीं जानती थी ...गिरीश भी नहीं ...बांहें बदन से अलग नहीं होतीं ...कसती जा रही हैं ..जितना पा सकते हो ..पा लो ...अगला क्षण क़यामत का क्षण होगा ...सारी जिंदगी तुम्हारी आँखें उसे देखना चाहेंगी ...जिसे तुम सबसे ज्यादा प्यार करते हो ....तुम सब देखोगे ...बस उसे नहीं .ऋतु पर जैसे जुनून सवार था ...ये दो बदन अनंत काल तक साथ रहें....समय कहीं नहीं जायेगा ...इनकी चौखट से लग कर बैठा रहेगा ....जब ये चाहेगें ...तभी उठेगा ...आगे बढेगा ...आज समय ने सिर झुका लिया है ...बस अन्दर से टूटी –फूटी आवाजें उस तक पहुँच रहीं हैं .....

‘गिरीश .....गिरीश ...मुझे बहुत प्यार करो ..ये न जाने कैसी प्यास है ....इस प्यार की ...जितना मिलता है ...कम पड़ता है ...गिरीश ...चलो हम कहीं भाग चलें ...तुम्हारे साथ मैं कहीं भी जी लूंगी ...फुटपाथ पर ..नदी के किनारे..पेड़ों के नीचे...पहाड़ों पर..कहीं ...कहीं भी ...गिरीश ...गिरीश ....’

समय ने उठकर चलना आरम्भ कर दिया है ...आरम्भ ...वह तो चल ही रहा है ..तभी से ...जिसे लगा है ..उसकी अपनी मन:स्थिति है.

रात के दस बज गए हैं ...दोनों को अभी भी होश नहीं ...आखिर गिरीश ने ही याद दिलायी ...ऋतु ने उसके होंठ चूमे और ख़ामोशी से तैयार होने लगी ..गिरीश ने तैयार होकर दो कप चाय मंगवायी और कुछ खाने को भी .दोनों ने सिर्फ चाय पी और बाहर आ गये.

गिरीश स्कूटर चला रहा है ,ऋतु चुप है ...जाने क्या खोया ...क्या पाया ...उसका अपना आप ही उससे खो गया ....जाने वह खुश है या उदास ? रास्ते भर कोई कुछ न बोला ,मौन की भाषा कहीं अधिक सार्थक होती है ...

रेस्ट हॉउस के सामने स्कूटर रुका .ऋतु उतर कर उसके सामने आ गयी ...

‘गिरीश मैं सोचती थी, यह एक दिन मैं अपनी छाती से लगाकर आराम से जी लूंगी....अब तो मेरे सारे दिन ही खो गए ...’उसकी आवाज़ कांप रही है ..वह समूची कांप रही है .गिरीश ने एक गहरी सांस ली ,उसके गाल थपथपाये और दोनों अन्दर आ गए ...चौकीदार ने उन्हें घूरकर देखा ...टीचर और सहेलियां बाहर आ गए. ऋतु नहीं जानती उन्हें क्या –क्या फब्तियां और आक्षेप मिले ....गिरीश ने किस तरह सफाई दी? बस इतना याद है, गिरीश ने उसका हाथ हलके से दबा कर छोड़ दिया और हारे हुए क़दमों से बाहर आ  गया.

सारी बातें ऋतु के सिर के ऊपर से गुज़र रहीं हैं ..वह चुप है ..उसे कुछ नहीं कहना ..कुछ नहीं सुनना ...जो उसके अन्दर है ...इतना गहरा की कोई आवाज़ ..कोई ताकत उसे छू नहीं सकती .अन्दर जाने का आदेश सुन वह थके क़दमों से ऊपर की ओर चल पड़ी.

दरवाज़ा अनीता ने खोला ....उसने गौर से ऋतु को देखा ...थकान ...टूटन ...उदासी ..ख़ुशी ...निराशा ...जाने क्या –क्या था उसके चेहरे पर .उसने ऋतु की बांह पकड़ उसे अन्दर खींच लिया .ऋतु ने उसकी तरफ देखा नहीं ...अपनी भर आयी आँखों को पोंछा और बिस्तर की ओर बढ़ी ही थी कि अनिता ने खींचकर उसे अपने गले से लगा लिया. सारा बाँध टूट गया और वह अनु के कंधे से लग फूट पड़ी .....

(लेखिका देश की प्रख्यात कहानीकार हैं। इन दिनों रायपुर में रहती हैं।)

 

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