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साहित्य

अपने-अपने पहाड़


- अनिल विभाकर

चींटियां पहाड़ कभी नहीं चढ़तीं

हमेशा पहाड़ ढोती हैं चींटियां

पहाड़ नहीं होते सबके लिए पहाड़

सबके अपने-अपने पहाड़ होते हैं

जिन्हें हम पहाड़ कहते हैं

पृथ्वी के लिए वे महज गट्ठर हैं

जैसे आदमी के सिर पर होता है गट्ठर

पहाड़ भी वैसे ही हैं पृथ्वी के सिर पर

चींटियों के लिए पहाड़ कभी पहाड़ नहीं हुए

उनके लिए एक बड़ा कण भी पहाड़ हो जाता है

पहाड़ पर तो मैदानी चाल से चलती हैं चींटियां

(अनिल विभाकर हिंदी के वरिष्ठ और चर्चित कवि हैं। प्रखर अभिव्यक्ति के लिए सुख्यात कवि विभाकर के दो कविता संग्रह 'शिखर में आग' और 'सच कहने के लिए' काफी चर्चित रहे हैं। कविताओं में बेबाक अभिव्यक्ति उनकी विशिष्टता है। देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं, सामयिक लेख और समीक्षाएं छपती रही हैं। विभाकर हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार भी हैं। उन्होंने हिंदी दैनिक 'आज' और 'हिन्दुस्तान' में कई वर्षों तक वरिष्ठ पदों पर कार्य किया। वे 'जनसत्ता' के रायपुर संस्करण और 'नवभारत' के  भुवनेश्वर  संस्करण के स्थानीय संपादक भी रहे हैं।)

 

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